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पर भारत वहीँ का वहीँ है

आज़ादी के सत्तर वर्षों बाद,
तिरंगा आज भी हर छत पर गर्व से लहरा रहा है।
अपने व्यस्त जीवन से एक दिन निकाल,
हर भारतवासी शहीदों को याद कर,
भारतमाता को शीश नवा रहा है।
कितना वक़्त गुज़र गया,
कितनी सत्ताएँ पलट गयीं,
पर उन्नीस सौ सैंतालिस से दो हज़ार सत्रह तक,
कुछ तो बदलाव आये ही होंगे न?
आज 15 अगस्त केवल स्वन्त्रता दिवस नहीं रह गया है।
कुछ के लिए यह एक छुट्टी का दिन है, national holiday.
तो कुछ के लिए झंडे बेच एक वक़्त रोटी खाने का ज़रिया।
कोई मोर्चा निकाल देशभक्ति की आड़ में अपना ही उल्लू सीधा कर रहा है,
तो कोई महज़ एक दिन के लिए उन वीर जवानों को श्रद्धांजलि दे रहा है
जिनके परिवार वालों को पहले न जाने कितनी बार ही दुत्कारा।
सोमवार को छुट्टी कर, कितने ही short trip पर निकल गए,
जो बचे कुछ देश की हालत से बेख़बर, गलियों के कोने में नशे से धुत हैं पड़े।
क्या करें ज़नाब!
देश अब modern हो गया है,
लोग busy हो गए हैं।
अब वो देश पर मर मिटने का जुनून
पागलपन कहलाता है।
पुरुषों के समान हक़ माँगती हर औरत
Feminist कहलाती है।
वो जो देर रात काम कर घर आती है न,
उसे तो क्या क्या बुलाते हैं, अब कैसे बताऊँ?
चीन सीमा लांघ कितना ही आतंक क्यों न फैला ले,
शाहरुख़ की नयी फ़िल्म ने 100 करोड़ कमाया या नहीं, युवा पीढ़ी को तो इसकी पड़ी है।
हाँ बस इतना सा ही बदला है भारत,
बाक़ी तो सब आज भी वैसा ही है।
एक टुकड़े ज़मीन पर सत्तर साल पहले भी लड़ रहे थे,
आज भी लड़ रहे हैं।
ये मेरा, वो तेरा की जंग में जवान तब भी मर रहे थे,
देश, नदी, पहाड़, सब की ख़ातिर आज भी शहीद हो रहे हैं।
हरा, केसरिया, हर रंग की राजनीति पहले भी पुरज़ोर चलती थी,
गाय, बकरी, मुर्गी तक तो आज बस इसके छींटे आ गए हैं।
हाँ, भारत वहीँ का वहीँ है,
बस अंदाज़ नए से हैं।
धुंधली पड़ती कुछ आँखों ने एक स्वतन्त्र जमीं का ख़्वाब देखा था,
छोड़ गए वो हमारे हाथों में बागडोर
कि हम एक नए दीये से नवीन उजाला लाएंगे।
पर हमने तो केवल पुराने को ही recycle किया,
संविधान हो या समस्याएं, किसी को भी सरल नहीं किया।
किसान तो आज भी मर रहा है,
औरतें अब भी रो रही हैं,
गरीब आज भी भूखा है,
अमीर आज भी बेचैन है।
वक़्त तो लम्बा गुज़र गया,
पर भारत वहीँ का वहीँ है।
पर भारत वहीँ का वहीँ है।।

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